रांची: झारखंड में राज्यसभा चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है. भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के मैदान में उतरने से चुनावी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं. सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से कांग्रेस के प्रणव झा और झामुमो के बैजनाथ राम चुनावी मैदान में हैं, जबकि उनकी जीत सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कंधों पर मानी जा रही है.
महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि राज्यसभा चुनाव को लेकर झामुमो और कांग्रेस के बीच अंदरूनी असहजता देखने को मिल रही है. परिमल नाथवानी के नामांकन के दौरान कांग्रेस नेताओं ने जिस तरह खुलकर विरोध दर्ज कराया, उसमें गठबंधन के अन्य दलों की सक्रियता नजर नहीं आई. झामुमो, राजद और माले के नेताओं की दूरी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
नामांकन प्रक्रिया के दौरान कांग्रेस के कुछ मंत्रियों ने विधानसभा प्रशासन और अधिकारियों की कार्यशैली पर नाराजगी जताई थी. वहीं, उस समय विधानसभा अध्यक्ष की अनुपस्थिति को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में विभिन्न तरह की चर्चाएं होती रहीं.
पहले भी सामने आ चुके हैं मतभेद
यह पहला अवसर नहीं है जब कांग्रेस और झामुमो के रिश्तों में खटास की चर्चा हुई हो. इससे पहले असम और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों के दौरान भी दोनों दलों के नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से मतभेद सामने आए थे. राज्यसभा चुनाव ने इन चर्चाओं को फिर से हवा दे दी है.
उम्मीदवार चयन पर सहयोगी दलों की नाराजगी
राजद और माले के कुछ नेताओं ने भी उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को लेकर असंतोष जताया है. उनका कहना है कि प्रत्याशियों के चयन से पहले उनसे पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया गया. वहीं, नाथवानी के नामांकन के खिलाफ हुए विरोध कार्यक्रम में उनकी सीमित भागीदारी को लेकर भी सवाल उठे, जिस पर सहयोगी दलों का कहना है कि उन्हें कार्यक्रम की पूर्व जानकारी नहीं दी गई थी.
जीत के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाने में जुटे नाथवानी
राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए आवश्यक संख्या हासिल करने की चुनौती परिमल नाथवानी के सामने भी है. माना जा रहा है कि उन्हें एनडीए के 24 विधायकों का समर्थन मिल सकता है, लेकिन जीत सुनिश्चित करने के लिए उन्हें कुछ अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी. उनके समर्थकों का दावा है कि विभिन्न दलों के नेताओं और विधायकों से उनके लंबे समय से अच्छे संबंध रहे हैं, जिसका लाभ उन्हें मिल सकता है.
झारखंड की राजनीति में नाथवानी का पुराना अनुभव
झारखंड की राजनीति में परिमल नाथवानी का नाम नया नहीं है. वर्ष 2008 में उन्होंने पहली बार राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की थी. उस समय मधु कोड़ा सरकार को झामुमो और कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था. चुनाव के दौरान झामुमो के कई विधायकों ने नाथवानी का समर्थन किया था, जिससे उन्होंने आधिकारिक उम्मीदवार को पराजित कर दिया था.
कांग्रेस सतर्क, हर वोट की अहमियत
नाथवानी की उम्मीदवारी ने कांग्रेस खेमे को भी पूरी तरह सतर्क कर दिया है. पार्टी के सामने अपने सभी विधायकों को एकजुट रखने के साथ-साथ गठबंधन सहयोगियों के वोट सुनिश्चित करने की चुनौती है. दूसरी ओर, नाथवानी के समर्थक व्यक्तिगत स्तर पर विधायकों से संपर्क साधने और समर्थन जुटाने में सक्रिय बताए जा रहे हैं.
पुराने राज्यसभा चुनाव भी रहे विवादों में
झारखंड के राज्यसभा चुनावों का इतिहास भी कई राजनीतिक विवादों और चर्चाओं से जुड़ा रहा है. वर्ष 2010 में झामुमो ने अंतिम समय में अपना उम्मीदवार बदलकर उद्योगपति केडी सिंह को मैदान में उतारा था. वहीं 2012 के चुनाव में कथित खरीद-फरोख्त के आरोपों ने राज्य की राजनीति को हिला दिया था और कई नेताओं के नाम जांच एजेंसियों की जांच में सामने आए थे.
ऐसे में 2026 का राज्यसभा चुनाव केवल सीटों का मुकाबला नहीं, बल्कि गठबंधन की मजबूती, राजनीतिक रणनीति और विधायकों की निष्ठा की भी बड़ी परीक्षा माना जा रहा है.













