झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेताओं में गिने जाने वाले शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, नेतृत्व और जनसेवा की एक प्रेरणादायक कहानी है. उनका जन्म 11 जनवरी 1944 को वर्तमान झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था. बचपन में उनका नाम शिवलाल था, लेकिन आगे चलकर वे शिबू सोरेन के नाम से पूरे देश में प्रसिद्ध हुए.
शिबू सोरेन को मरणोपरांत मिला पद्मभूषण सम्मान
झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक शिबू सोरेन को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मभूषण से मरणोपरांत सम्मानित किया गया. यह सम्मान उनके सामाजिक योगदान और जनकल्याण के क्षेत्र में किए गए लंबे संघर्ष को मान्यता देने के रूप में दिया गया. नई दिल्ली में आयोजित विशेष समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान प्रदान किया. दिवंगत नेता की ओर से उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने पुरस्कार ग्रहण किया.
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 25 जनवरी को पद्म पुरस्कारों की घोषणा की थी. देश के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को हर वर्ष इन सम्मानों से नवाजा जाता है.
बचपन और संघर्षों की शुरुआत
शिबू सोरेन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नेमरा के सरकारी विद्यालय से प्राप्त की और बाद में गोला हाई स्कूल में अध्ययन किया. उनके जीवन में सबसे बड़ा मोड़ 27 नवंबर 1957 को आया, जब उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या महाजनों द्वारा कर दी गई. सोबरन सोरेन एक शिक्षक होने के साथ-साथ गांधीवादी विचारों के समर्थक थे और जमीन हड़पने और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते थे. पिता की इस दर्दनाक मृत्यु ने युवा शिबू के जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने पढ़ाई छोड़कर समाज के अधिकारों की लड़ाई को अपना उद्देश्य बना लिया.
आदिवासी अधिकारों के लिए आंदोलन
युवावस्था में ही उन्होंने शोषण और अन्याय के खिलाफ लोगों को संगठित करना शुरू कर दिया. आदिवासी समाज को एकजुट करने के लिए उन्होंने संताल नवयुवक संघ और सोनोत संताल समाज जैसे संगठनों का गठन किया. इसके बाद उन्होंने धनकटनी आंदोलन की अगुवाई की, जिसने आदिवासी समुदाय के अधिकारों की लड़ाई को नई ऊर्जा प्रदान की.
गोला, बोकारो, जैनामोड़ और टुंडी क्षेत्रों में उन्होंने आंदोलन को मजबूत किया. इसी दौरान उनकी मुलाकात झारखंड आंदोलन के दूसरे बड़े नेता विनोद बिहारी महतो से हुई. बाद में पारसनाथ की पहाड़ियों और टुंडी क्षेत्र को उन्होंने अपने आंदोलन का प्रमुख केंद्र बनाया.
सामाजिक परिवर्तन की पहल
टुंडी और आसपास के इलाकों में शिबू सोरेन ने केवल राजनीतिक आंदोलन ही नहीं चलाया, बल्कि सामाजिक सुधार के लिए भी कई पहल कीं. उन्होंने सामूहिक खेती, पशुपालन और रात्रि पाठशालाओं की व्यवस्था शुरू कर ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया. उस समय क्षेत्र में उनकी एक प्रभावशाली सामाजिक व्यवस्था भी मानी जाती थी, जहां स्थानीय विवादों का समाधान उनके नेतृत्व में किया जाता था.
झामुमो की स्थापना और झारखंड आंदोलन
साल 1973 में शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और ए.के. राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की. संगठन में विनोद बिहारी महतो अध्यक्ष बने, जबकि शिबू सोरेन को महासचिव की जिम्मेदारी मिली. आपातकाल के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा. 1977 में उन्होंने टुंडी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली.
राष्ट्रीय राजनीति में पहचान
1980 में वे दुमका से लोकसभा सदस्य चुने गए और इसके बाद कई बार संसद पहुंचे. उन्होंने राज्यसभा में भी प्रतिनिधित्व किया. अलग झारखंड राज्य की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने और उसे जनआंदोलन का स्वरूप देने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही. 1987 में निर्मल महतो की हत्या के बाद उन्होंने झामुमो की कमान संभाली और पार्टी के अध्यक्ष बने.
मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ, लेकिन इसके बावजूद शिबू सोरेन राज्य के पहले मुख्यमंत्री नहीं बन सके. हालांकि बाद के वर्षों में उन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाला.
2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन सदन में बहुमत साबित नहीं कर सके.
2008 में दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
2009 में तमाड़ विधानसभा उपचुनाव हारने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा.
दिसंबर 2009 में वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बने.
2010 में उनकी सरकार गिर गई और कार्यकाल समाप्त हो गया.
सांसद के रूप में सक्रिय भूमिका
2014 के लोकसभा चुनाव में देशभर में चली मोदी लहर के बावजूद उन्होंने दुमका संसदीय क्षेत्र से जीत हासिल की. 2019 में चुनाव हारने के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया, जहां उन्होंने झारखंड और आदिवासी हितों से जुड़े मुद्दों को उठाना जारी रखा.
संगठन में नई भूमिका
15 अप्रैल 2025 को झामुमो के महाधिवेशन में पार्टी नेतृत्व की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी को सौंपते हुए हेमंत सोरेन को अध्यक्ष बनाया गया. वहीं, शिबू सोरेन को पार्टी का संस्थापक संरक्षक नियुक्त किया गया, जिससे संगठन में उनकी मार्गदर्शक भूमिका बनी रही.
अंतिम विदाई
लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया. उनके निधन के साथ झारखंड आंदोलन के एक युग का अंत हुआ, लेकिन आदिवासी अधिकारों, सामाजिक न्याय और झारखंड की पहचान के लिए उनके संघर्ष को हमेशा याद किया जाएगा.













