रांची: झारखंड में JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और CBI जांच की मांग को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब अपने तीसरे सप्ताह में पहुंच गया है. 25 जुलाई से शुरू हुए इस आंदोलन ने शुरुआती दिनों में तेजी से रफ्तार पकड़ी. 29 जुलाई को रांची की सड़कों पर हजारों अभ्यर्थियों की मौजूदगी ने सरकार पर दबाव बढ़ाया, लेकिन लगातार कई दिनों तक धरना, बारिश, अनशन और फिर विधानसभा मार्च के बाद आंदोलन की तस्वीर अब कुछ बदली हुई नजर आ रही है.
हालांकि, छात्रों की रोजाना मौजूदगी की कोई आधिकारिक संख्या जारी नहीं हुई है, इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि आंदोलन निश्चित तौर पर कितने प्रतिशत कमजोर हुआ है. लेकिन शुरुआती बड़े मार्च की तुलना में स्थायी धरना स्थल पर भीड़ के स्वरूप में बदलाव जरूर दिखाई दे रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या JPSC-JSSC आंदोलन अपने चरम के बाद अब धीरे-धीरे ठहराव की ओर बढ़ रहा है?
25 जुलाई: अनिश्चितकालीन सत्याग्रह की शुरुआत
JPSC परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर अभ्यर्थियों ने रांची के मोरहाबादी स्थित बापू वाटिका में अनिश्चितकालीन सत्याग्रह शुरू किया. छात्रों की प्रमुख मांगों में परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच, विवादित परीक्षा को रद्द करना और भर्ती व्यवस्था में सुधार शामिल था. इसी दौरान JPSC मामले में CID की कार्रवाई भी तेज थी और 25 जुलाई तक मामले में कुल 10 गिरफ्तारियां हो चुकी थीं.
शुरुआत में आंदोलन का केंद्र मुख्य रूप से JPSC परीक्षा में कथित अनियमितताओं पर था, लेकिन धीरे-धीरे JSSC समेत दूसरी भर्ती परीक्षाओं के मुद्दे भी आंदोलन से जुड़ते चले गए.
28 जुलाई: आंदोलन स्थल बदला, संघर्ष का दायरा बढ़ा
आंदोलन के चौथे दिन प्रदर्शनकारियों ने बापू वाटिका से जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम को अपना धरना स्थल बनाया. इसके बाद स्टेडियम आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन गया. इसी बीच पूर्व JPSC अध्यक्ष एल. खियांग्ते से CID ने करीब नौ घंटे पूछताछ की.
29 जुलाई: पहली बड़ी ताकत दिखाई दी
29 जुलाई को आंदोलन ने बड़ा रूप लिया. राज्य के अलग-अलग हिस्सों से अभ्यर्थी रांची पहुंचे और जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से अल्बर्ट एक्का चौक तक मार्च निकाला। PTI के अनुसार इस मार्च में हजारों छात्र शामिल हुए.
इस दौरान 14वीं JPSC PT परीक्षा रद्द करने, JPSC-JSSC में कथित अनियमितताओं की जांच और CBI जांच जैसी मांगें प्रमुखता से उठीं.
यही वह दौर था जब आंदोलन ने पहली बार बड़े स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक ध्यान खींचा.
30 जुलाई से 1 अगस्त: समर्थन बढ़ा, धरना जारी
30 जुलाई को AJSU के युवा और छात्र संगठनों ने भी JPSC-JSSC मुद्दे पर मार्च निकाला और CBI जांच की मांग की. आंदोलन को राजनीतिक समर्थन मिलने लगा, हालांकि मूल धरना छात्र नेतृत्व में ही जारी रहा.
1 अगस्त तक आंदोलन को लगभग एक सप्ताह हो चुका था. बारिश और खराब मौसम के बावजूद अभ्यर्थी जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में डटे रहे। रिपोर्टों में धरना स्थल पर सैकड़ों छात्रों के मौजूद रहने की बात सामने आई.
2 अगस्त: मशाल जुलूस और अनशन से आंदोलन को नई धार
आंदोलन के दसवें दिन 2 अगस्त को छात्रों ने मशाल जुलूस निकाला. इसी दौर में छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो का अनशन भी आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन गया.
खुले आसमान और बारिश के बीच छात्रों के डटे रहने से आंदोलन की तस्वीर भावनात्मक रूप से भी मजबूत हुई. सामाजिक संगठनों और अन्य लोगों का समर्थन भी आंदोलन को मिलने लगा.
5 से 8 अगस्त: सरकार से बातचीत, लेकिन समाधान नहीं
सरकार और छात्रों के बीच बातचीत का दौर शुरू हुआ, लेकिन मांगों को लेकर सहमति नहीं बन सकी. छात्रों ने आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया और विधानसभा घेराव की तैयारी शुरू कर दी. 8 अगस्त तक देवेंद्र नाथ महतो का अनशन सातवें दिन में पहुंच चुका था.
इस बीच आंदोलन को बाहर से भी समर्थन मिला. लेकिन यही वह चरण था जब आंदोलन दो हिस्सों में दिखाई देने लगा—एक तरफ लगातार धरने पर बैठे छात्र, दूसरी तरफ अलग-अलग संगठनों के कार्यक्रम और राजनीतिक समर्थन.
9 अगस्त: सरकार का दावा बनाम छात्रों की नाराजगी
9 अगस्त आंदोलन के लिए अहम दिन रहा. सरकार की ओर से छात्रों की कई मांगों को स्वीकार किए जाने की बात सामने आई, जबकि छात्रों ने इसे पर्याप्त नहीं माना. सबसे बड़ा मतभेद CBI जांच और बाकी लंबित मांगों को लेकर बना रहा.
इसका नतीजा यह हुआ कि बातचीत के बावजूद आंदोलन समाप्त नहीं हुआ और 10 अगस्त के विधानसभा मार्च का कार्यक्रम कायम रहा.
10 अगस्त: आंदोलन का सबसे बड़ा टकराव
10 अगस्त को छात्र विधानसभा की ओर मार्च करने के लिए जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जुटे. विधानसभा की ओर बढ़ते समय बैरिकेडिंग को लेकर स्थिति तनावपूर्ण हो गई. पुलिस ने पानी की बौछार, आंसू गैस और बल प्रयोग का सहारा लिया. कुछ प्रदर्शनकारियों पर बैरिकेड तोड़ने और पथराव के आरोप भी सामने आए, जबकि प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए.
इस घटना ने आंदोलन को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया, लेकिन साथ ही आंदोलन के सामने एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी—क्या लगातार टकराव के बाद लंबे समय तक बड़ी संख्या में छात्रों को धरना स्थल पर बनाए रखा जा सकेगा?
11-13 अगस्त: क्या आंदोलन की रफ्तार धीमी पड़ रही है?
10 अगस्त की बड़ी भीड़ और टकराव के बाद अब आंदोलन का अगला चरण सामने है. 13 अगस्त को रांची प्रशासन ने 20 अगस्त को प्रस्तावित मुख्यमंत्री आवास घेराव को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है. यानी आंदोलन खत्म नहीं हुआ है और आगे भी कार्यक्रम प्रस्तावित हैं.
लेकिन दूसरी तरफ, स्थायी धरना स्थल की भीड़ शुरुआती बड़े मार्च जैसी दिखाई नहीं दे रही है. यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में 11, 12 या 13 अगस्त के लिए छात्रों की दैनिक संख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है. इसलिए इसे निश्चित संख्या में गिरावट के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा.
फिर भी आंदोलन के मौजूदा स्वरूप को देखकर यह कहा जा सकता है कि शुरुआती दिनों का व्यापक जनसमूह अब एक स्थायी धरना और अगले बड़े कार्यक्रम की तैयारी में बदलता दिखाई दे रहा है.
13 अगस्त को सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक प्रशासन ने धरना स्थल पर तिरपाल लगाने से भी रोक दिया, जिसके बाद छात्रों को धूप में प्रदर्शन करने की बात सामने आई. इससे आंदोलनकारियों के सामने मौसम और लंबे समय तक धरना जारी रखने की चुनौती भी बढ़ती दिख रही है.
आंदोलन कमजोर या रणनीतिक ठहराव?
JPSC-JSSC आंदोलन को फिलहाल पूरी तरह कमजोर कहना जल्दबाजी होगी. इसकी वजह साफ है—10 अगस्त के बाद भी आंदोलनकारियों ने 20 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास घेराव का कार्यक्रम घोषित किया है और प्रशासन ने उसके मद्देनजर सुरक्षा बढ़ा दी है.
लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि 29 जुलाई के हजारों छात्रों वाले मार्च और उसके बाद के रोजाना धरने की तस्वीर एक जैसी नहीं है. शुरुआती दौर में आंदोलन ने जिस तेजी से व्यापक समर्थन जुटाया था, वह भीड़ अब मुख्य रूप से स्थायी धरने और अगले बड़े कार्यक्रमों के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई दे रही है.
यानी फिलहाल आंदोलन खत्म होने की स्थिति में नहीं है, लेकिन उसका स्वरूप जरूर बदल रहा है—सड़क पर उमड़ी बड़ी भीड़ से लेकर लंबे समय तक चलने वाले धरने तक.
आगे क्या?
अब आंदोलन की अगली बड़ी परीक्षा 20 अगस्त को होगी. यदि मुख्यमंत्री आवास घेराव में फिर बड़ी संख्या में अभ्यर्थी जुटते हैं, तो यह संकेत होगा कि आंदोलन की जमीनी ताकत अभी कायम है. इसके विपरीत यदि स्थायी धरना स्थल और बड़े कार्यक्रमों में भागीदारी लगातार कम होती है, तो आंदोलन के कमजोर पड़ने की चर्चा को और बल मिल सकता है.
फिलहाल JPSC-JSSC आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या शुरुआती दिनों का छात्र आक्रोश एक लंबे जनआंदोलन में बदल पाएगा या फिर लगातार धरने और टकराव के बीच इसकी भीड़ धीरे-धीरे सिमट जाएगी?













