बिहार की राजनीति में भाजपा विधान परिषद सदस्य (MLC) देवेश कुमार के इस्तीफे ने नया राजनीतिक घटनाक्रम खड़ा कर दिया है. उनके इस्तीफे के बाद राज्य सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने की तैयारी शुरू हो गई है. इससे फिलहाल उनके मंत्री पद पर मंडरा रहा संवैधानिक संकट टलता नजर आ रहा है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वह 2030 तक बिना किसी रुकावट के मंत्री बने रह पाएंगे?
यह मामला सिर्फ एक सीट भरने का नहीं, बल्कि संविधान, सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी प्रक्रिया, भाजपा की राजनीतिक रणनीति और एनडीए सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा की भूमिका से भी जुड़ा हुआ है.
आखिर मंत्री पद पर संकट क्यों आया?
दीपक प्रकाश को बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री बनाया गया, लेकिन नियुक्ति के समय वे विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे.
संविधान के प्रावधानों के मुताबिक कोई भी व्यक्ति मंत्री तो बन सकता है, लेकिन उसे निर्धारित समय के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है. ऐसा नहीं होने पर मंत्री पद छोड़ना पड़ता है.
इसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसमें सवाल उठाया गया कि बिना किसी सदन की सदस्यता के दीपक प्रकाश कितने समय तक मंत्री बने रह सकते हैं.
देवेश कुमार के इस्तीफे से कैसे निकला रास्ता?
कानूनी विवाद गहराने के बीच भाजपा ने समाधान तलाशते हुए अपने MLC देवेश कुमार से इस्तीफा दिलाने का फैसला किया. अब उनकी खाली हुई सीट पर दीपक प्रकाश को भेजने की तैयारी है.
अगर दीपक प्रकाश विधान परिषद के सदस्य बन जाते हैं, तो संवैधानिक रूप से उनका मंत्री पद फिलहाल सुरक्षित हो जाएगा और तत्काल संकट समाप्त हो जाएगा.
क्या अब 2030 तक सुरक्षित रहेगा मंत्री पद?
यहीं से मामला थोड़ा पेचीदा हो जाता है. देवेश कुमार को राज्यपाल के मनोनीत कोटे से 17 मार्च 2021 को विधान परिषद का सदस्य बनाया गया था. उनका कार्यकाल मार्च 2027 तक ही निर्धारित था.
ऐसे में यदि दीपक प्रकाश इसी सीट से विधान परिषद पहुंचते हैं, तो उन्हें नया छह साल का कार्यकाल नहीं मिलेगा. वे केवल शेष कार्यकाल यानी मार्च 2027 तक ही सदस्य रहेंगे.
इसका मतलब है कि अगले कुछ महीनों बाद उन्हें फिर से विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना होगा. यदि ऐसा नहीं होता है तो उनका मंत्री पद दोबारा संवैधानिक संकट में आ सकता है. इसलिए मौजूदा व्यवस्था को स्थायी समाधान नहीं माना जा रहा है.
भाजपा ने इतना बड़ा फैसला क्यों लिया?
राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा लगातार यह संदेश देते रहे कि दीपक प्रकाश को केवल कुछ महीनों के लिए नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल के लिए मंत्री बनाया गया है.
सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद भी दीपक प्रकाश ने कहा था कि सरकार अदालत में अपना पक्ष रखेगी और उन्हें एनडीए नेतृत्व और संवैधानिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा है.
राजनीतिक सूत्रों की मानें तो बढ़ते दबाव के बीच भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने इस समाधान पर सहमति दी, जिसके बाद देवेश कुमार ने इस्तीफा दिया. माना जा रहा है कि बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने भी इस फैसले का समर्थन किया.
भाजपा के लिए उपेंद्र कुशवाहा क्यों महत्वपूर्ण हैं?
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के चार विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे. इनमें उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता कुशवाहा भी शामिल हैं.
चुनाव के बाद पार्टी के विधायकों के टूटने और भाजपा में विलय की अटकलें जरूर लगीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भाजपा भी अपने इस सहयोगी दल को नाराज करने के पक्ष में नहीं दिखी.
जातीय गणना के अनुसार बिहार में कुशवाहा समाज की आबादी करीब 4.2 प्रतिशत बताई जाती है. राज्य की लगभग 50 विधानसभा सीटों और नौ लोकसभा क्षेत्रों में इस समाज का प्रभाव माना जाता है. ऐसे में भाजपा के लिए उपेंद्र कुशवाहा सिर्फ एक सहयोगी नेता नहीं, बल्कि अहम सामाजिक समीकरण का हिस्सा हैं. इसी राजनीतिक महत्व को देखते हुए भाजपा ने हाल के महीनों में अपने समर्थन से उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भी भेजा था.













